संसार की रंझिशों को तोड़ कर मैं उड़ चला बादलों में कहीं,
हर पल, हर लम्हा, मैं भरता हूँ एक उड़ान नई,
संसार की रंझिशों को तोड़ कर मैं उड़ चला बादलों में कहीं।
वो बंदिशें, वो फासलें, जब खुली हवा में साँस लें,
महसूस करता हूँ मैं ऐसा,
के उस नए जन्म में ले गया मैं खुशनुमा अरमान कई,
संसार की रंझिशों को तोड़ कर मैं उड़ चला बादलों में कहीं।
मेरी फिक्र बिल्कुल क्षीण थी, मेरा दुख बिल्कुल क्षीण था,
मैं बस हर ऊंचाई को छूने में लीन था,
झूम रहा था आसमान, झूम रही थी ये ज़मीन,
जब मैंने खुली हवा में एक नई सांस ली,
बस सुख ही सुख था, बस सुख ही सुख था,
महसूस किया न दुख फिर कभी,
संसार की रंझिशों को तोड़ कर मैं उड़ चला बादलों में कहीं।